वित्तीय बाजारों में फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट निवेश और व्यापार का एक शक्तिशाली साधन है, जो ‘डेरिवेटिव’ (Derivatives) की श्रेणी में आता है। सरल शब्दों में कहें तो, यह भविष्य की अनिश्चितताओं को आज की कीमत पर बांधने का एक तरीका है।
चाहे वह कोई किसान हो जो अपनी फसल की सही कीमत चाहता है, या कोई बड़ी कंपनी जो कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से डरती है—फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट सबको एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। वहीं दूसरी ओर, शेयर बाजार के ट्रेडर्स के लिए यह कम पूंजी में बड़ा मुनाफा कमाने का एक ‘हाई-रिस्क, हाई-रिवॉर्ड’ (High Risk, High Reward) अवसर है।
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फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट क्या है?
यह दो पक्षों के बीच एक कानूनी समझौता है, जिसमें भविष्य की एक निश्चित तारीख पर, पहले से तय कीमत पर किसी एसेट (शेयर, गोल्ड, या कमोडिटी) को खरीदने या बेचने का दायित्व होता है।
भारतीय शेयर बाजार में इंडेक्स (जैसे Nifty 50) और चुनिंदा शेयरों में फ्यूचर्स ट्रेडिंग होती है।
फ्यूचर्स मार्केट में ट्रेडर्स बिना एसेट की डिलीवरी लिए भी पैसा कमा सकते हैं।
मार्जिन ट्रेडिंग
आपको पूरी रकम नहीं, बल्कि सिर्फ शुरुआती मार्जिन (जैसे 10-20%) जमा करना होता है।
लेवरेज (Leverage)
कम पैसे में बड़ी पोजीशन लेना। जैसे ₹2 लाख जमा करके ₹20 लाख के फ्यूचर्स खरीदना।
लेवरेज से मुनाफा बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन गलत दांव लगने पर भारी नुकसान भी हो सकता है।
नुकसान होने पर ब्रोकर आपसे और पैसा जमा करने को कह सकता है; न देने पर आपकी पोजीशन कम कीमत पर काटी जा सकती है।
मार्केट लॉट
फ्यूचर्स को एक-एक शेयर में नहीं, बल्कि लॉट (Lot) में बेचा जाता है
समय सीमा (Expiry)
आप 1, 2, या 3 महीने के कॉन्ट्रैक्ट ले सकते हैं।
एक्सपायरी नियम
सभी कॉन्ट्रैक्ट महीने के आखिरी गुरुवार को एक्सपायर होते हैं।
स्क्वायर अप
आप कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने से पहले कभी भी अपनी पोजीशन से बाहर निकल सकते हैं।
डेरिवेटिव
यह एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट है जिसका मूल्य किसी अंडरलाइंग एसेट (जैसे शेयर, सोना, या गेहूं) की कीमत से तय होता है।
फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट
यह खरीदार और विक्रेता के बीच एक समझौता है, जो भविष्य में एक तय तारीख पर, एक निश्चित कीमत पर किसी एसेट को खरीदने या बेचने का अधिकार (और दायित्व) देता है।
हेजिंग (Hedging): जोखिम से बचाव का तरीका
कंपनियां और सरकारें कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचने के लिए फ्यूचर्स का उपयोग करती हैं।
उदाहरण
यदि आपको हर महीने 100 क्विंटल गेहूं चाहिए और आप ₹2,000/क्विंटल पर कॉन्ट्रैक्ट फिक्स कर लेते हैं। यदि बाजार भाव ₹2,500 हो जाता है, तब भी आप ₹2,000 में ही खरीदेंगे (₹50,000 की बचत)। यदि बाजार भाव ₹1,500 गिर जाता है, तब भी आपको ₹2,000 ही देने होंगे (₹50,000 का घाटा)।
तेल आयात करने वाले देश (Oil Futures) और चॉकलेट कंपनियां (Cocoa Futures) इसका बखूबी इस्तेमाल करती हैं।
फ्यूचर्स ट्रेडिंग कम कैपिटल के साथ बड़ा एक्सपोजर पाने का एक शानदार तरीका है, लेकिन यह अत्यधिक जोखिम भरा भी है। खासकर कमोडिटी मार्केट की अस्थिरता और हाई लेवरेज नए ट्रेडर्स के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इसमें अनुशासन और सीमा में रहकर ट्रेड करना ही सफलता की कुंजी है।
निष्कर्ष
फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स वित्तीय बाजार का एक ऐसा सशक्त टूल हैं, जो न केवल बड़े संस्थानों और सरकारों को कीमतों के जोखिम से सुरक्षा (Hedging) प्रदान करते हैं, बल्कि व्यक्तिगत ट्रेडर्स के लिए कम पूंजी में बड़े मुनाफे के द्वार भी खोलते हैं।
हालाँकि, इसकी चमक के पीछे ‘लेवरेज’ (Leverage) का बड़ा जोखिम छिपा होता है। जहाँ एक तरफ आप मात्र 10-20% मार्जिन देकर बड़ी पोजीशन ले सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ बाजार की एक छोटी सी विपरीत हलचल आपकी पूरी जमा पूंजी को खत्म कर सकती है।
बिना स्टॉप-लॉस और रिस्क मैनेजमेंट के फ्यूचर्स में उतरना जुए के समान हो सकता है।
ट्रेड करने से पहले अंडरलाइंग एसेट, लॉट साइज और एक्सपायरी के नियमों को गहराई से समझें।
हमेशा अपनी वित्तीय क्षमता और रिस्क सहने की शक्ति के अनुसार ही लेवरेज का उपयोग करें।
संक्षेप में, फ्यूचर्स ट्रेडिंग उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो बाजार की दिशा को समझते हैं और जिनमें घाटे को नियंत्रित करने का अनुशासन है। यदि आप सावधानी और सही रणनीति के साथ आगे बढ़ते हैं, तो फ्यूचर्स मार्केट आपके पोर्टफोलियो को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।
FAQ
फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट और कैश मार्केट (Spot Market) में क्या अंतर है?
कैश मार्केट में आप शेयर की पूरी कीमत चुकाकर उसे तुरंत खरीदते हैं और उसके मालिक बन जाते हैं। इसके विपरीत, फ्यूचर्स में आप भविष्य की किसी तारीख के लिए सौदा करते हैं और केवल एक छोटा मार्जिन जमा करके बड़ी मात्रा में ट्रेडिंग करते हैं।
‘एक्सपायरी’ (Expiry) का क्या मतलब है?
हर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की एक समय सीमा होती है। भारतीय शेयर बाजार में, इंडेक्स और स्टॉक फ्यूचर्स हर महीने के आखिरी गुरुवार को एक्सपायर (समाप्त) हो जाते हैं। एक्सपायरी के बाद वह पुराना कॉन्ट्रैक्ट मान्य नहीं रहता।
क्या मैं एक्सपायरी से पहले अपना प्रॉफिट बुक कर सकता हूँ?
हाँ, बिल्कुल। इसे ‘स्क्वायर अप’ (Square off) करना कहते हैं। आप एक्सपायरी डेट का इंतज़ार किए बिना बाजार के चालू समय में कभी भी अपने कॉन्ट्रैक्ट को बेचकर (या खरीदकर) बाहर निकल सकते हैं।
मार्जिन कॉल (Margin Call) क्या होता है?
जब आपके ट्रेड में नुकसान होने लगता है और आपके पास जमा किया गया मार्जिन एक न्यूनतम स्तर से नीचे चला जाता है, तो ब्रोकर आपसे और पैसा जमा करने को कहता है। इसी चेतावनी को ‘मार्जिन कॉल’ कहते हैं। पैसा न देने पर ब्रोकर आपकी पोजीशन काट सकता है।
‘लॉट साइज’ (Lot Size) क्या होता है?
फ्यूचर्स में आप अपनी मर्जी से 1 या 2 शेयर नहीं खरीद सकते। एक्सचेंज हर स्टॉक के लिए एक निश्चित संख्या तय करता है, जिसे ‘लॉट’ कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि निफ्टी का लॉट साइज 25 है, तो आपको कम से कम 25 के मल्टीपल में ही ट्रेड करना होगा।
लेवरेज (Leverage) को दोधारी तलवार क्यों कहा जाता है?
लेवरेज आपको कम पैसे में बड़ी पोजीशन लेने की सुविधा देता है। अगर बाजार आपके पक्ष में है, तो आपको बहुत कम पूंजी पर बड़ा मुनाफा होगा। लेकिन अगर बाजार थोड़ा भी आपके खिलाफ गया, तो आपको अपनी पूंजी से कहीं ज्यादा नुकसान भी हो सकता है।
Disclaimer:- Web1Solve शेयर मार्केट में इन्वेस्टमेंट और ट्रेड को सपोर्ट या प्रोत्साहित नहीं करता है। यह आर्टिकल सिर्फ एजुकेशन और जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है। निवेश करने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श जरूर लें।